Saturday, 28 April 2012

किसी सही दिन


किसी उजली जगमगाती सुबह
जब आसमान होगा साफ शफ्फ़ाक़
सूरज पर नहीं होगी गर्द
पेड़ होंगे सही सही हरे
जब अखबार में नहीं होगी कोई बुरी ख़बर
आंगन में बेखौफ़ चहचहाएंगी गोरैया
जब बीती रात का कोई डरावना सपना
आंखों पर बोझ की मानिंद टंगा नहीं होगा
और आंखे देखेंगी बिल्कुल वही जो है दरअस्ल
जब बच्चे फिक़्रों के बस्ते छोड़
रेत पर दौड़ेंगे नंगे पांव
रसोई में गुनगुनाएंगी हवाएं
जब दिन छाती पर पहाड़ सा नहीं
मन पर रूई सा उगेगा
तब तुम मिलने आना ऐ दोस्त
आज का दिन मुलाक़ात के लिए मुफ़ीद नहीं....

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