चाहा तो था
सारी उम्र गुज़ार दूं
तुम्हारे साथ
तुम्हारा ही हाथ पकड़
तय करूं ज़िंदगी के रास्ते
तुम मेरा पहला प्यार
मेरी ख्वाहिशों के गवाह
तुम्हारे ही आसमान तले
ज़िंदगी को जाना
तुम
महज़ एक शहर नहीं
मेरी आदत हो...
चाहा तो था
बड़े तालाब में नहाकर आए रोज़ मेरे घर सूरज
भारत भवन में कट जाए तमाम शामें
वो दूरदर्शन को जाती रूमानी सड़क
न्यू मार्केट में दोस्तों का जमावड़ा
चौक की चटखारेदार यादें
वो सदर मंज़िल की रौनक़
गौहर महल के मेले...
चाहा तो था
मेरे खतों पर हो हमेशा तुम्हारा पता
तुम्हारे ही सीने से लग मिलता है सुक़ून
तुम्हारी ही गोद में सो रही है मेरी मां
तुम
महज़ एक शहर नही
मेरा मायका हो
और मैं तुमसे बेपनाह प्यार करती हूं
चलते चलते ये छोटी सी गुज़ारिश है मेरी
मुझे याद रखना
हो सके तो फिर बुलाना
दोस्त मुहम्मद खान....
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