Saturday, 28 April 2012

बारूद शहर

बारूद के शहर में
फूलों से बनी लड़की
धुएं के समंदर में
खुशबू से सनी लड़की
विस्फोट की गली के
सुर ताल बदल देगी
सोचती है इक दिन
ये हाल बदल देगी
ये हाल जो बदला तो
बारूद जो पिघला तो
फूलों का शहर होगा
खुशबू में बसर होगा

अतीत नहीं अबीत


जो बीत कर भी नहीं बीता
ठहरा है कहीं भीतर, गहरे
अतीत नहीं...अबीत
इस अबीत में मां है
छोंक लगाती,स्वेटर बुनती
उपन्यास पढ़ती
दिल्ली की रवानगी पर
गुझिया नमकीन
और तीन वक्त के परांठे देती
साथ में ढेर सी हिदायतें
पहुंचकर फोन करना
सेहत का खयाल रखना
कोई लड़का अच्छा लगे तो बताना
मां हर सर्दी में बनाती थी
मेथी के लड्डू
पता नहीं मेवों का असर था या हाथ का
मेथी के लड्डू कभी कड़वे नहीं लगे...
इस अबीत में है पहला प्यार
सबसे छिपकर दो चार नज़रें मिलाना
पुरानी लूना पर बैठना कम
घसीटना ज़्यादा
हरे स्कूटर की फटफटिया आवाज़ से
धड़कनों की जुगलबंदी
तुम्हारी थाली से पापड़ भर का हिस्सा
कभी कभार धीरे से हाथों का छू जाना
जैसे फिल्मी बैकग्राउंड में गीतों की झंकार...
इस अबीत में बर्थडे पर
नई फ्राक पहनकर फोंटो खिंचाने
पापा के साथ स्टूडियो जाना
जैसे कोई उत्सव का दिन
तब भाई बहन के साथ
नहीं थे समझदारी भरे रिश्ते
खूब होती थी लड़ाई
अक्सर मैं चुराती थी दीदी के टिफिन से अचार...
अबीत में है कुछ पुराने सीरियल्स
कर्मभूमि, पलाश के फूल
गायब आया और पोटली बाबा की
इनके टाइटल सांग तो अब भी याद है
याद है ये भी कि रेडियो पर आता था नया सवेरा...
और भी काफी कुछ है अबीत में
छत पर खड़े कुछ लड़के
अपनी बेस्ट फ्रेंड से बेबात लड़ाई
क्योंकि उसका रंग गोरा था
एकाध बार घर से कुछ सिक्के चुराना
और किराने की दुकान से लेना
गटागट या रूपये सी शकल की टॉफी
अखबार में छपी पहली कविता
पहली नौकरी का पहला दिन
अजनबियों का दोस्तों में बदलना
और दोस्तों का अजनबियों में...
अबीत में बहुत सारे किस्से हैं
चंद उदास रूमानी कविताएं
डायरी के कुछ पन्ने भी
कुछ खत, कुछ ईमेल
कुछ छिपे हुए खज़ाने...
यादों की शक्ल में
मेरे वजूद का हिस्सा
कैसे कहूं गुज़र चुका
बीत गया
जो है अबीत....

चलो कुछ बात करें


चलो कुछ बात करें
फूल की, रोशनी की, हवाओं की
एक किस्सा मैं कहूं समंदर का
एक तुम सुनाओ जंगल का
एक वो कि जिसमें परियां हो...
चलों एक खेल खेलें गुड़ियों का
करे फिर ब्याह
हो दावत बिन पकवानों की...
फिर रूठें मनाएं फिर झगड़े
फिर हाथ पकड़ के साथ चलें
तुम धीरे से मेरे कानों में
कोई बात कहो और मैं हंस दूं
और मैं तुम्हारी पलकों के
इक रेशे को भींच मुठ्ठी में
सांस रोककर कुछ मांगू दुआ...
चलो कुछ देर हम यूं ही
उस मोड़ तक एक साथ चलें
जहां से हमको बिछड़ जाना है......

जब तुम साथ होते हो



जब तुम साथ होते हो
आसमान गहरा नीला होता है
पत्ते होते हैं ज़्यादा हरे
सुर्ख हो जाती है ढलती शाम,

जब तुम साथ होते हो
हर तलाश लेती है विराम
हर आस को मिलती है पनाह
मन की कोख से पैदा होते हैं सपने,

जब तुम साथ होते हो
घुलने लगती है दर्द की बर्फ
आकार लेते हैं दुआओं के चेहरे
मैं मुस्कुराती हूं कुछ ज़्यादा
जब तुम साथ होते हो...

भोपाल के नाम एक खत


चाहा तो था
सारी उम्र गुज़ार दूं
तुम्हारे साथ
तुम्हारा ही हाथ पकड़
तय करूं ज़िंदगी के रास्ते
तुम मेरा पहला प्यार
मेरी ख्वाहिशों के गवाह
तुम्हारे ही आसमान तले
ज़िंदगी को जाना
तुम
महज़ एक शहर नहीं
मेरी आदत हो...
चाहा तो था
बड़े तालाब में नहाकर आए रोज़ मेरे घर सूरज
भारत भवन में कट जाए तमाम शामें
वो दूरदर्शन को जाती रूमानी सड़क
न्यू मार्केट में दोस्तों का जमावड़ा
चौक की चटखारेदार यादें
वो सदर मंज़िल की रौनक़
गौहर महल के मेले...
चाहा तो था
मेरे खतों पर हो हमेशा तुम्हारा पता
तुम्हारे ही सीने से लग मिलता है सुक़ून
तुम्हारी ही गोद में सो रही है मेरी मां
तुम
महज़ एक शहर नही
मेरा मायका हो
और मैं तुमसे बेपनाह प्यार करती हूं
चलते चलते ये छोटी सी गुज़ारिश है मेरी
मुझे याद रखना
हो सके तो फिर बुलाना
दोस्त मुहम्मद खान....

जादू लोग


कुछ लोग जादू से बने होते हैं
जैसे बचपन की नुक्कड़ का वो हलवाई
भद्दी काली डरावनी सी शकल
ज्यों रिसालों से निकला हो अय्यार कोई
पर उसके हाथों की बनी जो भी मिठाई खाई
ज़मानेभर की शक्कर उन्हीं हाथों में मिली....

कुछ लोग जादू से बने होते हैं
जैसे दिल्ली की वो काफ़िर लड़की
जो मेरी दोस्त है हमराज़ भी है
जो मुझे मेरी तरह जानती है
जो बिना बात किए बोलती है
इन दिनों भी वो जी खोल के हंस लेती है....

कुछ लोग जादू से बने होते हैं
जैसे बाबा मेरे
किसी सोख्ता कागज़ की तरह
मैं जब भी ग़मों की स्याही बिखेर लेती हूं
वो चुपचाप उसे खुद में सोख लेते हैं
बाद इसके भी इतने उजले हैं
जैसे सूरज हो मेरी दुनिया का
रोशनी भी, धूप भी, ताक़त भी मेरी....

कुछ लोग जादू से बने होते हैं
तुम भी हो ना
जब भी तुम्हारे क़रीब आई हूं
इक नया दर्द लेके लौटी हूं
दर्द तुम्हारे भीतर कुछ ऐसे ठहरे हैं
जो बस मेरी राह तकते हैं
तुमपे बेअसर है, बेसबब हैं जो
वो दर्द मुझपे यूं गुज़रते हैं
जैसे जादू ही हो गया हो कोई
और फिर मैं कहां रह जाती हूं
मैं भी जादू में बदल जाती हूं

कुछ लोग जादू से बने होते हैं..........

लाल रंग की लड़की


यूं तो कई रंगों की होती हैं
हरी नीली पीली गुलाबी कत्थई सफेद
लेकिन लाल रंग की लड़कियां
कुछ खास अलग होती हैं
बिल्कुल लाल...दहकती सी
या कभी ठहरी हुई
जैसे बुझती आंच
आंच पर दमक उठती एकाध चिंगारी
अक्सर बहते लहू सी ज़रूरी
ना थोड़ा कम ना ज़्यादा
उगते-डूबते सूरज सी लाल
कभी प्रेम का लाल
कभी विस्फोट का
रंगों के फेरबदल वाली दुनिया में
लाल रंग की लड़की
अपने ही रंग में जीती लड़ती जूझती
पर नहीं बदलती रंग
ऐसा जी पाना
अमूमन कहां हो पाता है
अब किसी और रंग में
तभी तो कुछ खास अलग होती हैं
लाल रंग की लड़कियां....