हिन्दी का कस्बा
Saturday, 28 April 2012
मां
गुनगुनी धूप से बुना स्वेटर
नर्म हाथों की सेंक सा महफूज़
मैं इसे जब कभी पहनती हूं
मां की खुशबू से महक जाती हूं
मां मुझे याद बहुत आती है
मां मुझे हर बरस रूलाती है....
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