Saturday, 28 April 2012

चलो कुछ बात करें


चलो कुछ बात करें
फूल की, रोशनी की, हवाओं की
एक किस्सा मैं कहूं समंदर का
एक तुम सुनाओ जंगल का
एक वो कि जिसमें परियां हो...
चलों एक खेल खेलें गुड़ियों का
करे फिर ब्याह
हो दावत बिन पकवानों की...
फिर रूठें मनाएं फिर झगड़े
फिर हाथ पकड़ के साथ चलें
तुम धीरे से मेरे कानों में
कोई बात कहो और मैं हंस दूं
और मैं तुम्हारी पलकों के
इक रेशे को भींच मुठ्ठी में
सांस रोककर कुछ मांगू दुआ...
चलो कुछ देर हम यूं ही
उस मोड़ तक एक साथ चलें
जहां से हमको बिछड़ जाना है......

No comments:

Post a Comment