काश मैं ये जान पाती
तुम्हें जाने की
जल्दी है
तो सच मानो कभी
लड़ती नहीं
ना ही बहस करती
तुम्हारी बात भी ना
टालती
हर रोज़ सुबहो शाम
तुमको फोन करती
तुम्हें छूती मैं
जीभर के
तुम्हारा हाथ थाम और
पढ़ लेती
मैं जीवन का ककहरा
वो जो स्वेटर अधूरा
छोड़ के तुम जा चुकी हो
वो वैसा ही पड़ा है
तुम्हें बुनना था
मेरी ज़िंदगी को और थोड़ा
मैं भी अधूरी सी
पड़ी हूं
काश में ये जान पाती
तुम्हें जाने की
जल्दी है
तो बुनना सीख लेती
स्वेटर भी...ये जीवन
भी
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