Saturday, 28 April 2012

मां


काश मैं ये जान पाती

तुम्हें जाने की जल्दी है

तो सच मानो कभी लड़ती नहीं

ना ही बहस करती

तुम्हारी बात भी ना टालती

हर रोज़ सुबहो शाम तुमको फोन करती

तुम्हें छूती मैं जीभर के

तुम्हारा हाथ थाम और पढ़ लेती

मैं जीवन का ककहरा

वो जो स्वेटर अधूरा छोड़ के तुम जा चुकी हो

वो वैसा ही पड़ा है

तुम्हें बुनना था मेरी ज़िंदगी को और थोड़ा

मैं भी अधूरी सी पड़ी हूं

काश में ये जान पाती

तुम्हें जाने की जल्दी है

तो बुनना सीख लेती

स्वेटर भी...ये जीवन भी

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