जो बीत कर भी नहीं बीता
ठहरा है कहीं भीतर, गहरे
अतीत नहीं...अबीत
इस अबीत में मां है
छोंक लगाती,स्वेटर बुनती
उपन्यास पढ़ती
दिल्ली की रवानगी पर
गुझिया नमकीन
और तीन वक्त के परांठे देती
साथ में ढेर सी हिदायतें
पहुंचकर फोन करना
सेहत का खयाल रखना
कोई लड़का अच्छा लगे तो बताना
मां हर सर्दी में बनाती थी
मेथी के लड्डू
पता नहीं मेवों का असर था या हाथ का
मेथी के लड्डू कभी कड़वे नहीं लगे...
इस अबीत में है पहला प्यार
सबसे छिपकर दो चार नज़रें मिलाना
पुरानी लूना पर बैठना कम
घसीटना ज़्यादा
हरे स्कूटर की फटफटिया आवाज़ से
धड़कनों की जुगलबंदी
तुम्हारी थाली से पापड़ भर का हिस्सा
कभी कभार धीरे से हाथों का छू जाना
जैसे फिल्मी बैकग्राउंड में गीतों की झंकार...
इस अबीत में बर्थडे पर
नई फ्राक पहनकर फोंटो खिंचाने
पापा के साथ स्टूडियो जाना
जैसे कोई उत्सव का दिन
तब भाई बहन के साथ
नहीं थे समझदारी भरे रिश्ते
खूब होती थी लड़ाई
अक्सर मैं चुराती थी दीदी के टिफिन से अचार...
अबीत में है कुछ पुराने सीरियल्स
कर्मभूमि, पलाश के फूल
गायब आया और पोटली बाबा की
इनके टाइटल सांग तो अब भी याद है
याद है ये भी कि रेडियो पर आता था नया सवेरा...
और भी काफी कुछ है अबीत में
छत पर खड़े कुछ लड़के
अपनी बेस्ट फ्रेंड से बेबात लड़ाई
क्योंकि उसका रंग गोरा था
एकाध बार घर से कुछ सिक्के चुराना
और किराने की दुकान से लेना
गटागट या रूपये सी शकल की टॉफी
अखबार में छपी पहली कविता
पहली नौकरी का पहला दिन
अजनबियों का दोस्तों में बदलना
और दोस्तों का अजनबियों में...
अबीत में बहुत सारे किस्से हैं
चंद उदास रूमानी कविताएं
डायरी के कुछ पन्ने भी
कुछ खत, कुछ ईमेल
कुछ छिपे हुए खज़ाने...
यादों की शक्ल में
मेरे वजूद का हिस्सा
कैसे कहूं गुज़र चुका
बीत गया
जो है अबीत....
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