बहुत आसान लगता था
जो बचपन में
जी भर के लड़ाई और
फिर झट से सुलह करना
कभी जो चोट लग जाए
तो सबके सामने रोना
बगल वाले किसी घर
में बिना न्योते के ही दावत
किसी घर से चुराकर
फूल बस्ते में छिपा लेना
भरे बाज़ार में एक
चीज़ पर जमकर मचल जाना
कभी अपनी सहेली से
बदलना फ्रॉक या चुन्नी
बहुत आसान लगता था
जो बचपन में
बड़े होते ही जैसे
खो गया है
ना जाने इस बड़प्पन
में हमें क्या हो गया है
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